*मै ना मानूं हार*
समय-नियति पर पूर्ण नियंत्रण ,
रहा नहीं कभी किसी मनुज का ,
जो है जितना है उसको ही लेकर ,
हे वीर बढ़ो तुम अपने पथ पर ।
राम राज्य लाने का निश्चय ,
रहा अटल अब और रहेगा ,
भारत का ध्वज रहे प्रतिष्ठित ,
संकल्प सदा अटूट रहेगा ।
हम पथिक कंटीले मार्गों के हैं ,
इन पर ही तो हमने चलना सीखा ,
ऊंची समुद्र की लहरों से क्या भय ,
इन पर ही तो था पालना तब अपना ।
आरंभ हमारा नहीं सरल था ,
मार्ग हमारा अत्यंत विषम था ,
आपदाओं को चीर चीर कर ,
हमने अपना संसार बसाया ।
जब साधन संपन्न नहीं थे ,
तब सतत् संघर्ष थे करते ,
पथ से अपने नहीं डिगे थे ,
मरु भूमि में थे बीज रोपते ।
एक विपत्ति जो आज आ गयी ,
तो क्यों मैं अपनी हिम्मत हारूं ,
फिर से नयी रणनीति तय कर
विजय घोष का तंत्र बनाऊं ।
राम आज भी साथ मेरे हैं ,
कृष्ण सारथी साथ खड़े हैं ,
शिव शक्ति की प्रचण्ड ऊर्जा ,
मेरे रक्त में धधक रही है ।
धर्म ध्वजा की पूर्ण स्थापना ,
करने को मैं निकल चला हूं ,
जिसको आना है साथ चले वो ,
मैं परशुराम वंशज निर्भय हूं ।
संकल्प मेरा मैं दोहराता हूं ,
राग वीर रस का गाता हूं ,
एक एक हिन्दू को समझाता हूं ,
युद्ध भूमि में लेकर आता हूं ।
क्योंकि ये सब मेरे अपने हैं ,
इनके भी मुझ जैसे सपने हैं ,
शत्रु के कुत्सित जाल में फंसकर ,
थोड़े-थोड़े से ये विचलित हैं ।
तप पूर्वजों का व्यर्थ ना होने पाए ,
ना बलिदान असंख्य निरर्थक जाऐं ,
विश्व शिखर पर हिन्दू ध्वज लहराकर ,
अपना संकल्प सिद्ध करूं मैं ॥
प्राँजल शुकुल
05 जून 2024