Thursday, 23 June 2022

दिव्या सनातन

*दिव्य सनातन*

प्रकृति का जो भौतिक नियमन है , वही सनातन है । जिन गूढ़ सिद्धांत-नियमों से परमात्म तत्व प्रकृति-पदार्थ में प्रवर्तित होता है , वही सृष्टि-धर्म कहलाता है । और सृजन के आरंभ से जो पंचमहाभूत दृश्यमान होते हैं और सृष्टि के समारोप तक विध्यमान रहते है , वे सभी उसी ओंकार के स्पंदन से स्पंदित होते है जिससे महतत्व का निर्माण होता है । इसी ओंकार का स्फुरण समस्त सृष्टि में व्याप्त होकर वेद की ॠचाओ का प्रतिपादन करता है और यही वेद की ॠचाऐं समस्त ब्रम्हाण्ड मे गतिमान हैं। इन्ही वैदिक ॠचाओ का भौतिक सूत्र-स्वरूप  जिन नियमों का द्योतक है , वही सनातन धर्म है , वही हिन्दुत्व है ।

जिस प्रकार से प्रकृति को कोई अन्य शक्ति नष्ट कर ही नहीं सकती , किसी कालखण्ड में हानि भले ही पहुंचा दे , उसी प्रकार से किसी समय-काल में हिन्दुत्व को हानि तो हो सकती है परन्तु हिन्दुत्व को नष्ट कर पाना , समाप्त कर पाना किसी भी शक्ति के सामर्थ्य से परे है । क्योंकि इसकी उत्पत्ति,  संवर्धन और संरक्षण तो स्वयं परा-शक्ति करती है ।
जो प्रकृति के अनुरूप है , अनुकूल है और सामंजस्य में है , वही कालांतर में रहने योग्य है , अन्यथा अन्य जो भी हैं उनका काल कवलित होना निश्चित है ।
यही सुर-असुर का भेद है ।
सनातन तो प्रकृति के अधीन है , सनातन तो प्रकृति का ही अंग है और सनातन ही प्रकृति का जीव को जड़ता से चेतन की ओर ले जाने वाला माध्यम भी है ।
सनातन का कोई विकल्प ही नही ।

इति ।।

प्राँजल शुकुल 

बात हौसलों की है

"बात हौसलों की है"

तूफानों का क्या ,
उन्हे तो आना है ,
तबाही मचाना है ,
और चले जाना है ।

बात तो हौसलों की है ,
तूफानों से टकराना है ,
सब मिटता देखकर भी ,
बचे हुए को सम्हालना है ।

दिल से रिसती पीड़ा को ,
इन्हे ही दबाना है ,
उखडती सांसो को फिर ,
इन्हें ही तो चलाना है ।

- प्राँजल शुकुल

17 मई 2021 

अंतर

*अंतर* 

बात जहां तक ले जानी है ,
पहले सोच वहां पहुचे ,
मन तो ठहरा चंचल भंवरा ,
आज यहाँ कल कहाँ टिके ।

धरती से देखो दूर गगन तक ,
सब कुछ कितना नवल दिखे ,
जब देखो चढ़कर पर्वत पर  ,
धरती ही कुछ और दिखे ।

यहाँ मेघ जो जल बरसाते ,
पर्वत पर वह बन हिम गिरे ,
यहाँ कलकल कर बहती नदिया ,
वहां ठोस हिमखंड बने। 

कहाँ तुम्हे जाना है राही ,
तय पहले यह लक्ष्य करो ,
और लक्ष्य पर जब मैं पहुंचू ,
क्या करना यह ध्यान करो ।

मार्ग अनेकों मिल जाऐंगे, 
पर तुम फिर भी मनन करो ,
चयन मार्ग का बड़ा झमेला ,
सरल कठिन का भेद करो ।

क्योंकि ध्येय तक बड़ा मार्ग है ,
यहाँ समय होगा अधिकांश व्यय  ,
पर यह भी तो है तुम्हें सोचना ,
क्या नहीं इसमें व्यय करना अपना ।

इन मार्गों में कांटो के संग ,
डग डग पर है बिखरा मैला  ,
अपने निर्मल अंतः करण को ,
बड़े यत्न से स्वच्छ है रखना ।


प्राँजल शुकुल 
23 06 2022

प्रवाह

*प्रवाह*

नदी किनारे बैठ देखता ,
तिनके पत्तों का बह जाना ,
वेग जहाँ लेकर के जाता ,
वहीं उन्हे है रमते जाना । 

जीवन का आनंद यही है ,
बैठो माया की लहरों पर , 
करो नही संघर्ष व्यर्थ का ,
जहाँ लहर हो बहते जाना। 

लहरों की इस ऊंच नीच में ,
सांसो को ऐसे ही थामे ,
देखो तट के दृश्य मनोरम ,
कुछ भी यहाँ ना रहने वाला ।

है आज लहर के उपर जो पत्ता ,
धीरे धीरे वह गल जाएगा ,
तब वह लहर के नीचे जाकर ,
नदिया का ही हिस्सा बन जाएगा। 


:
प्राँजल शुकुल / 20 जून 2022