Thursday, 23 June 2022

प्रवाह

*प्रवाह*

नदी किनारे बैठ देखता ,
तिनके पत्तों का बह जाना ,
वेग जहाँ लेकर के जाता ,
वहीं उन्हे है रमते जाना । 

जीवन का आनंद यही है ,
बैठो माया की लहरों पर , 
करो नही संघर्ष व्यर्थ का ,
जहाँ लहर हो बहते जाना। 

लहरों की इस ऊंच नीच में ,
सांसो को ऐसे ही थामे ,
देखो तट के दृश्य मनोरम ,
कुछ भी यहाँ ना रहने वाला ।

है आज लहर के उपर जो पत्ता ,
धीरे धीरे वह गल जाएगा ,
तब वह लहर के नीचे जाकर ,
नदिया का ही हिस्सा बन जाएगा। 


:
प्राँजल शुकुल / 20 जून 2022

No comments:

Post a Comment