*प्रवाह*
नदी किनारे बैठ देखता ,
तिनके पत्तों का बह जाना ,
वेग जहाँ लेकर के जाता ,
वहीं उन्हे है रमते जाना ।
जीवन का आनंद यही है ,
बैठो माया की लहरों पर ,
करो नही संघर्ष व्यर्थ का ,
जहाँ लहर हो बहते जाना।
लहरों की इस ऊंच नीच में ,
सांसो को ऐसे ही थामे ,
देखो तट के दृश्य मनोरम ,
कुछ भी यहाँ ना रहने वाला ।
है आज लहर के उपर जो पत्ता ,
धीरे धीरे वह गल जाएगा ,
तब वह लहर के नीचे जाकर ,
नदिया का ही हिस्सा बन जाएगा।
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प्राँजल शुकुल / 20 जून 2022
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