Thursday, 23 June 2022

अंतर

*अंतर* 

बात जहां तक ले जानी है ,
पहले सोच वहां पहुचे ,
मन तो ठहरा चंचल भंवरा ,
आज यहाँ कल कहाँ टिके ।

धरती से देखो दूर गगन तक ,
सब कुछ कितना नवल दिखे ,
जब देखो चढ़कर पर्वत पर  ,
धरती ही कुछ और दिखे ।

यहाँ मेघ जो जल बरसाते ,
पर्वत पर वह बन हिम गिरे ,
यहाँ कलकल कर बहती नदिया ,
वहां ठोस हिमखंड बने। 

कहाँ तुम्हे जाना है राही ,
तय पहले यह लक्ष्य करो ,
और लक्ष्य पर जब मैं पहुंचू ,
क्या करना यह ध्यान करो ।

मार्ग अनेकों मिल जाऐंगे, 
पर तुम फिर भी मनन करो ,
चयन मार्ग का बड़ा झमेला ,
सरल कठिन का भेद करो ।

क्योंकि ध्येय तक बड़ा मार्ग है ,
यहाँ समय होगा अधिकांश व्यय  ,
पर यह भी तो है तुम्हें सोचना ,
क्या नहीं इसमें व्यय करना अपना ।

इन मार्गों में कांटो के संग ,
डग डग पर है बिखरा मैला  ,
अपने निर्मल अंतः करण को ,
बड़े यत्न से स्वच्छ है रखना ।


प्राँजल शुकुल 
23 06 2022

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