Friday, 7 June 2024

मै ना मानूं हार

*मै ना मानूं हार*

समय-नियति पर पूर्ण नियंत्रण ,
रहा नहीं कभी किसी मनुज का ,
जो है जितना है उसको ही लेकर ,
हे वीर बढ़ो तुम अपने पथ पर ।

राम राज्य लाने का निश्चय ,
रहा अटल अब और रहेगा ,
भारत का ध्वज रहे प्रतिष्ठित ,
संकल्प सदा अटूट रहेगा ।

हम पथिक कंटीले मार्गों के हैं ,
इन पर ही तो हमने चलना सीखा ,
ऊंची समुद्र की लहरों से क्या भय ,
इन पर ही तो था पालना तब अपना ।

आरंभ हमारा नहीं सरल था ,
मार्ग हमारा अत्यंत विषम था ,
आपदाओं को चीर चीर कर ,
हमने अपना संसार बसाया ।

जब साधन संपन्न नहीं थे ,
तब सतत् संघर्ष थे करते ,
पथ से अपने नहीं डिगे थे ,
मरु भूमि में थे बीज रोपते ।

एक विपत्ति जो आज आ गयी ,
तो क्यों मैं अपनी हिम्मत हारूं ,
फिर से नयी रणनीति तय कर 
विजय घोष का तंत्र बनाऊं ।

राम आज भी साथ मेरे हैं ,
कृष्ण सारथी साथ खड़े हैं ,
शिव शक्ति की प्रचण्ड ऊर्जा ,
मेरे रक्त में धधक रही है ।

धर्म ध्वजा की पूर्ण स्थापना ,
करने को मैं निकल चला हूं ,
जिसको आना है साथ चले वो ,
मैं परशुराम वंशज निर्भय हूं ।

संकल्प मेरा मैं दोहराता हूं ,
राग वीर रस का गाता हूं ,
एक एक हिन्दू को समझाता हूं ,
युद्ध भूमि में लेकर आता हूं ।

क्योंकि ये सब मेरे अपने हैं ,
इनके भी मुझ जैसे सपने हैं ,
शत्रु के कुत्सित जाल में फंसकर ,
थोड़े-थोड़े से ये विचलित हैं ।

तप पूर्वजों का व्यर्थ ना होने पाए ,
ना बलिदान असंख्य निरर्थक जाऐं ,
विश्व शिखर पर हिन्दू ध्वज लहराकर ,
अपना संकल्प सिद्ध करूं मैं ॥

प्राँजल शुकुल 
05 जून 2024

Sunday, 12 March 2023

तृण को तीर बनाना है

*तृण को तीर बनाना है*


इतिहासों की यह बोझिल गाथा ,
दबा पड़ा उसमें सच का लावा, 
जब तब फूट फूट कर कहता ,
देखो भारत को किस किसने तारा। 

पृष्ठों में जो लिखा गया है ,
पूर्ण सत्य वह नहीं दर्शाता ,
मिट्टी खोद खोदकर देखो ,
बिखरा पड़ा है सत्य हमारा। 

मैकाले ने जो हमें पढ़वाया, 
मुगलों ने जो कुछ बनवाया ,
मार्क्सवाद ने जो लिखवाया, 
वह तो नहीं इतिहास हमारा। 

दाहिर से लेकर राणा तक ,
वीर शिवा से रंजीत राज तक ,
गुरुओं का बलिदान समर्पण, 
घर घर में यह दीप जलाना ।

भारत ना कभी किसी से हारा, 
आक्रान्ता को ना शासक माना ,
कालखण्ड औ भूमि भाग पर ,
बजता रहा प्रबल युद्ध नगाड़ा ।

दीन-हीन हम कभी नहीं थे ,
बस यह की हम सरल बहुत थे ,
कुटिलों को भी अपना समझा ,
यही त्रुटि इतिहास हमारा ।

और नहीं कुछ हमको करना ,
देव संस्कृति का पालन करना ,
पर यह भी अब ध्यान है रखना ,
शस्त्र- शास्त्र का संतुलन रखना ।

बन सबल अब लिखो सत्य को ,
भारत की वह स्वर्णिम गाथा ,
अपने स्व का भान कराकर ,
अब तृण को भी है तीर बनाना ।।


प्राँजल शुकुल 
12 03 2023

Friday, 4 November 2022

अंतर

*अंतर*

बात जहां तक ले जानी है ,
पहले सोच वहां पहुचे ,
मन तो ठहरा चंचल भंवरा ,
आज यहाँ कल कहाँ टिके ।

धरती से देखो दूर गगन तक ,
सब कुछ कितना नवल दिखे ,
जब देखो चढ़कर पर्वत पर  ,
धरती ही कुछ और दिखे ।

यहाँ मेघ जो जल बरसाते ,
पर्वत पर वह बन हिम गिरे ,
यहाँ कलकल कर बहती नदिया ,
वहां ठोस हिमखंड बने।

कहाँ तुम्हे जाना है राही ,
तय पहले यह लक्ष्य करो ,
और लक्ष्य पर जब मैं पहुंचू ,
क्या करना यह ध्यान करो ।

मार्ग अनेकों मिल जाऐंगे,
पर तुम फिर भी मनन करो ,
चयन मार्ग का बड़ा झमेला ,
सरल कठिन का भेद करो ।

मार्ग लक्ष्य तक बडा है लम्बा ,
समय अधिक होगा इसमें ही व्यय  ,
अब यह भी बस है तुम्हें सोचना ,
क्या नहीं इसमें हो अपना व्यय ।

इस मार्ग में कांटो के संग समझो ,
डग डग पर है बिखरा मैला  ,
कैसे अपने इस अंतः करण को ,
देखो यत्नों से निर्मल स्वच्छ रखना ।

प्राँजल शुकुल
23 06 2022

प्रवाह

*प्रवाह*

नदी किनारे बैठ देखता ,
तिनके पत्तों का बह जाना ,
वेग जहाँ लेकर के जाता ,
वहीं उन्हे है रमते जाना ।

जीवन का आनंद यही है ,
बैठो माया की लहरों पर ,
करो नही संघर्ष व्यर्थ का ,
जहाँ लहर हो बहते जाना।

लहरों की इस ऊंच नीच में ,
सांसो को ऐसे ही थामे ,
देखो तट के दृश्य मनोरम ,
कुछ भी यहाँ ना रहने वाला ।

है आज लहर के उपर जो पत्ता ,
धीरे धीरे वह गल जाएगा ,
तब वह लहर के नीचे जाकर ,
नदिया का ही हिस्सा बन जाएगा।
:
प्राँजल शुकुल / 20 जून 2022



भारत पुनः अखण्ड होगा

कश्मीर के संदर्भ में , मोदी जी के प्रति भारत के जन जन के उद्गारों को , इस कविता के माध्यम से प्रेषित करने का यह मेरा प्रयास है ।

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

यह समय नहीं विश्राम का ,
यह बेला नहीं विराम की ,
ये मोड़ है निश्चय को दृढ़ कर ,
पाने , भारत के सम्मान का ।

ना देखो जग की ओर सोच ,
कि वे क्या-कैसे हमें रोकेंगे ,
तुम देखो आस ले हिन्द खड़ा ,
कब स्थापित हो धर्म , शौर्य से ।

वो वीर शस्त्र ले खड़ा सजग ,
गौरव-गाथा का निज मान लिऐ ,
मन में पर उसके कितनी दुविधा ,
वो कब तक नित स्व-प्राण तजे ।

तुम तो बस यह इस बार करो ,
यह समय ना फिर से आएगा ,
जो आज किया वो रहे सदा ,
आगे ना कुछ भी हो पाएगा ।

तुम पर हम वारे जाते है ,
तन मन से हैं सब साथ खड़े ,
हर स्थिति संभालेंगे मिलकर ,
जो भी हो वो देखा जाऐगा ।

जो दोष दशकों से है मढ़ा ,
हम भारत की संतानों पर ,
जो पीड़ा हमने वर्षों सही ,
अपने ही घर के गद्दारों से ।

वह कलंक धुला दो माथे से ,
चाहे जो कीमत लगे अभी ,
परिस्थिति ना ऐसी फिर आऐगी ,
आने वाले शत कालों तक ।

जो रहें साथ स्वागत उनका ,
पर जो देखें स्वप्न विखंडन का ,
उनको उनका गंतव्य दिखा ,
पहुँचा दो जलती कबरो तक ।

ऐसा भीषण दो सबक सिखा ,
भारत के हर उस अपराधी को ,
साहस ना कर कोई पुनः सके ,
वैसा यत्न कभी कर सकने को ।

नही चाहिए वो धारा जो ,
धारा का ही अवरोध करे ,
नहीं सहमत उस अनुच्छेद से ,
जो जन-जन का विच्छेद करे ।

अब समय प्रबल है वीरों का ,
बस तेज राष्ट्र का बढ़ा चले ,
जो खण्डित हुआ वो भी लेंगे ,
औ भारत अखण्ड होगा फिर से ।

: प्राँजल शुक्ल

Time scale

Time scale

7 levels of time

Relativity

The smaller is the life span , the faster is the time interval of the minutest observable / perceivable time gap . Time moves faster at this level .

The longer is the lifespan  , slower is the speed of time .

To attain a higher level of existence  ,  the soul needs to raise its level & tune up to a state of higher level vibration .
At the highest level , this vibration is strongest but with a very low rhythmic frequency  and a very long wave length .

मैं मतवाला

अपनी ही मस्ती में जीता हूँ
चलने दो मुझे  राह पकड़कर
होगे तुम इस जंगल के राजा
मैं तो हूँ बस , हाथी-मतवाला

नहीं मुझे कुछ पाने की इच्छा
खाली पेट भी भरा हुआ है
जो ठीक लगे वह ही मैं करता
मुझे नही कोई कैसी भी चिंता

तुम ऊंचे बैठे हो या नीचे
फरक मुझे नहीं पडता इसका
मैं तो स्नेह का भाव समझता
सरल मनुज पर मरता मिटता

मेरा राजा राम , न दूजा
योगी केशव ही है गुरु मेरा
महादेव का हूँ मैं सेवक
जगदम्बा है मेरी माता

जीव रूप में हूँ मैं जन्मा
मायावश मैं-मैं मैं करता
नहीं यहाँ मेरा मन रमता
पूर्ण शून्य ही अपना डेरा