चलने दो मुझे राह पकड़कर
होगे तुम इस जंगल के राजा
मैं तो हूँ बस , हाथी-मतवाला
नहीं मुझे कुछ पाने की इच्छा
खाली पेट भी भरा हुआ है
जो ठीक लगे वह ही मैं करता
मुझे नही कोई कैसी भी चिंता
तुम ऊंचे बैठे हो या नीचे
फरक मुझे नहीं पडता इसका
मैं तो स्नेह का भाव समझता
सरल मनुज पर मरता मिटता
मेरा राजा राम , न दूजा
योगी केशव ही है गुरु मेरा
महादेव का हूँ मैं सेवक
जगदम्बा है मेरी माता
जीव रूप में हूँ मैं जन्मा
मायावश मैं-मैं मैं करता
नहीं यहाँ मेरा मन रमता
पूर्ण शून्य ही अपना डेरा
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