यह राज-भूमि है राघव की
यह कर्म -भूमि है केशव की
कण-कण मे यज्ञ की वेदी है
यहां वायु में वेदों का स्पंदन है
यह पावन भूमि है देवों की
यह पुण्य भूमि है ॠषियों की
जहाँ वेद ॠचाऐं प्रकट हुईं
जहाँ शास्त्र सहस्त्रों रचे गये
जब प्रलय काल था चहुँ ओर
तब यह भूमि जीवों का आश्रय बन
मानवता को आंचल में समेट अपने
थी वरदान स्वरूपा जग जननी
कितने आए और नष्ट हुए
इस पर विजय की आस लिए
कितनों के मद का मर्दन कर
यह भूमि सदा ही अजेय रही
तुम किन स्वप्नों में जीते हो
कब से तो यत्न यह करते हो
इसमें ही वो असुर भस्म हुए
जो इसे मिटाने आए थे
यह ध्वजा पताका भगवा है
प्रकृति की ही यह माया है
जिसने इसको उत्पन्न किया
इसे वही अक्षुण्ण बनाती है
यह धर्म सनातन तो है तब से
जबसे सृष्टि का सृजन हुआ
यह तब भी होगा विध्यमान
जब विलीन महाप्रलय में जग होगा
आ बैठो इनके चरणों में
शरण तुम्हे भी यह देगी
बुद्धि के विष को क्षीण कर
शुद्धि अमृत सम यह देगी
यह नित्य चिरंतन है सनातन
जिस पर है भैरव का पहरा
यह क्षेत्र महाकाल का है
जो समय-तत्व नियंता हैं
अपने अज्ञान का त्याग करो
देखो विष्णु की अद्भुत लीला
उसमें रमकर ही सत्य दिखे
और यहीं उद्धार तुम्हारा है
: प्राँजल शुक्ल
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