कल तक धूप जो चुभती थी ,
आज वही लगती मनभावन
कल जो गीत लगता था नीरस
जीवन उसी में आज झलकता
वह राह जिसका कल पग-पग
लगता था एक संघर्ष व्यर्थ सा
आज उसी का हर एक कंकर
याद दिलाता वो छोटा सा अनुभव
पेड़ आम का बड़ा विकट था
चढ़ना उसपर बड़ा कठिन था
आज वहीं वह खड़ा सजीला
कहता बचपन का मैं मित्र पुराना
नानी का वह सुन्दर आंगन
रात तारों को गिन कर सोना
सोते बारिश की बूँदें पडने पर
भाग बिस्तरे संग अंदर आना
बारिश की वह बूंदें पहली
मिट्टी का वह भीगा झौंका
चूल्हे की वह सौंधी रोटी
झाड़ी बेरों की कांटो वाली
उधर मोड़ पर पेड़ कबीट का
दस पत्थर पर गिरता एक था
मंदिर का मौंगरा भी आज तक
उन सालों की याद दिलाता
उठे सुबह तो माँ ने बतलाया
रात लक्ष्मी ने जनी है बछिया
आंखे मीड़ते भागे गौशाला
महीनों मना त्यौहार गले लगाकर
कल जिसका कोई मोल नहीं था
आज अनमोल है वही तुम देखो
आज हो रहा यह भी जो समझो
कल ही फिर से यह दोहराएगा
कुछ भी साथ नहीं जाएगा
धरा यहीं सब रह जाएगा
जीवन नया जब तुम्हें मिलेगा
चक्र यही बस दोहराएगा।
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