Friday, 4 November 2022

अंतर

*अंतर*

बात जहां तक ले जानी है ,
पहले सोच वहां पहुचे ,
मन तो ठहरा चंचल भंवरा ,
आज यहाँ कल कहाँ टिके ।

धरती से देखो दूर गगन तक ,
सब कुछ कितना नवल दिखे ,
जब देखो चढ़कर पर्वत पर  ,
धरती ही कुछ और दिखे ।

यहाँ मेघ जो जल बरसाते ,
पर्वत पर वह बन हिम गिरे ,
यहाँ कलकल कर बहती नदिया ,
वहां ठोस हिमखंड बने।

कहाँ तुम्हे जाना है राही ,
तय पहले यह लक्ष्य करो ,
और लक्ष्य पर जब मैं पहुंचू ,
क्या करना यह ध्यान करो ।

मार्ग अनेकों मिल जाऐंगे,
पर तुम फिर भी मनन करो ,
चयन मार्ग का बड़ा झमेला ,
सरल कठिन का भेद करो ।

मार्ग लक्ष्य तक बडा है लम्बा ,
समय अधिक होगा इसमें ही व्यय  ,
अब यह भी बस है तुम्हें सोचना ,
क्या नहीं इसमें हो अपना व्यय ।

इस मार्ग में कांटो के संग समझो ,
डग डग पर है बिखरा मैला  ,
कैसे अपने इस अंतः करण को ,
देखो यत्नों से निर्मल स्वच्छ रखना ।

प्राँजल शुकुल
23 06 2022

प्रवाह

*प्रवाह*

नदी किनारे बैठ देखता ,
तिनके पत्तों का बह जाना ,
वेग जहाँ लेकर के जाता ,
वहीं उन्हे है रमते जाना ।

जीवन का आनंद यही है ,
बैठो माया की लहरों पर ,
करो नही संघर्ष व्यर्थ का ,
जहाँ लहर हो बहते जाना।

लहरों की इस ऊंच नीच में ,
सांसो को ऐसे ही थामे ,
देखो तट के दृश्य मनोरम ,
कुछ भी यहाँ ना रहने वाला ।

है आज लहर के उपर जो पत्ता ,
धीरे धीरे वह गल जाएगा ,
तब वह लहर के नीचे जाकर ,
नदिया का ही हिस्सा बन जाएगा।
:
प्राँजल शुकुल / 20 जून 2022



भारत पुनः अखण्ड होगा

कश्मीर के संदर्भ में , मोदी जी के प्रति भारत के जन जन के उद्गारों को , इस कविता के माध्यम से प्रेषित करने का यह मेरा प्रयास है ।

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

यह समय नहीं विश्राम का ,
यह बेला नहीं विराम की ,
ये मोड़ है निश्चय को दृढ़ कर ,
पाने , भारत के सम्मान का ।

ना देखो जग की ओर सोच ,
कि वे क्या-कैसे हमें रोकेंगे ,
तुम देखो आस ले हिन्द खड़ा ,
कब स्थापित हो धर्म , शौर्य से ।

वो वीर शस्त्र ले खड़ा सजग ,
गौरव-गाथा का निज मान लिऐ ,
मन में पर उसके कितनी दुविधा ,
वो कब तक नित स्व-प्राण तजे ।

तुम तो बस यह इस बार करो ,
यह समय ना फिर से आएगा ,
जो आज किया वो रहे सदा ,
आगे ना कुछ भी हो पाएगा ।

तुम पर हम वारे जाते है ,
तन मन से हैं सब साथ खड़े ,
हर स्थिति संभालेंगे मिलकर ,
जो भी हो वो देखा जाऐगा ।

जो दोष दशकों से है मढ़ा ,
हम भारत की संतानों पर ,
जो पीड़ा हमने वर्षों सही ,
अपने ही घर के गद्दारों से ।

वह कलंक धुला दो माथे से ,
चाहे जो कीमत लगे अभी ,
परिस्थिति ना ऐसी फिर आऐगी ,
आने वाले शत कालों तक ।

जो रहें साथ स्वागत उनका ,
पर जो देखें स्वप्न विखंडन का ,
उनको उनका गंतव्य दिखा ,
पहुँचा दो जलती कबरो तक ।

ऐसा भीषण दो सबक सिखा ,
भारत के हर उस अपराधी को ,
साहस ना कर कोई पुनः सके ,
वैसा यत्न कभी कर सकने को ।

नही चाहिए वो धारा जो ,
धारा का ही अवरोध करे ,
नहीं सहमत उस अनुच्छेद से ,
जो जन-जन का विच्छेद करे ।

अब समय प्रबल है वीरों का ,
बस तेज राष्ट्र का बढ़ा चले ,
जो खण्डित हुआ वो भी लेंगे ,
औ भारत अखण्ड होगा फिर से ।

: प्राँजल शुक्ल

Time scale

Time scale

7 levels of time

Relativity

The smaller is the life span , the faster is the time interval of the minutest observable / perceivable time gap . Time moves faster at this level .

The longer is the lifespan  , slower is the speed of time .

To attain a higher level of existence  ,  the soul needs to raise its level & tune up to a state of higher level vibration .
At the highest level , this vibration is strongest but with a very low rhythmic frequency  and a very long wave length .

मैं मतवाला

अपनी ही मस्ती में जीता हूँ
चलने दो मुझे  राह पकड़कर
होगे तुम इस जंगल के राजा
मैं तो हूँ बस , हाथी-मतवाला

नहीं मुझे कुछ पाने की इच्छा
खाली पेट भी भरा हुआ है
जो ठीक लगे वह ही मैं करता
मुझे नही कोई कैसी भी चिंता

तुम ऊंचे बैठे हो या नीचे
फरक मुझे नहीं पडता इसका
मैं तो स्नेह का भाव समझता
सरल मनुज पर मरता मिटता

मेरा राजा राम , न दूजा
योगी केशव ही है गुरु मेरा
महादेव का हूँ मैं सेवक
जगदम्बा है मेरी माता

जीव रूप में हूँ मैं जन्मा
मायावश मैं-मैं मैं करता
नहीं यहाँ मेरा मन रमता
पूर्ण शून्य ही अपना डेरा 

कर्तव्य पथ

कर्तव्य पथ

कर्तव्य पथ पर बढ़ चला ,
मैं अडिग , केशव सा अडिग ,
कंटकों की चिंता नही ,
मैं अटल , माधव सा अटल ।

एक स्वप्न लेकर नेत्र में,
मै चल पड़ा हूँ अविचल ,
लक्ष्य जब तक ना प्राप्त हो ,
मैं अब ना बैठूं हो शिथिल ।

मेरे रक्त का हर एक कण ,
है कह रहा हर एक पल ,
जब तक है मुझमें लालिमा ,
तू बढ़ता चल , बढ़ता ही चल ।

मुट्ठी में मेरी भारत की रज ,
भरती देह में ऊर्जा प्रबल ,
साहस है किसमें रोक ले ,
मैं पाऊं निज ध्येय सकल ।

ना भय है , ना चिंता कोई,
ना द्वेष है , ना अनुराग ही ,
ना मन में है कोई लालसा ,
बस लक्ष्य है अपना साधना ।

और लक्ष्य यही सब जयकार करें ,
समझें और पालन नित्य करें ,
भारत का मंत्र सद्भाव का ,
विश्व के सकल कल्याण का ।

: प्राँजल शुक्ल 

जय भारती


यह राज-भूमि है राघव की
यह कर्म -भूमि है केशव की
कण-कण मे यज्ञ की वेदी है
यहां वायु में वेदों का स्पंदन है

यह पावन भूमि है देवों की
यह पुण्य भूमि है ॠषियों की
जहाँ वेद ॠचाऐं प्रकट हुईं
जहाँ शास्त्र सहस्त्रों रचे गये

जब प्रलय काल था चहुँ ओर
तब यह भूमि जीवों का आश्रय बन
मानवता को आंचल में समेट अपने
थी वरदान स्वरूपा जग जननी

कितने आए और नष्ट हुए
इस पर विजय की आस लिए
कितनों के मद का मर्दन कर
यह भूमि सदा ही अजेय रही

तुम किन स्वप्नों में जीते हो
कब से तो यत्न यह करते हो
इसमें ही वो असुर भस्म हुए
जो इसे मिटाने आए थे

यह ध्वजा पताका भगवा है
प्रकृति की ही यह माया है
जिसने इसको उत्पन्न किया
इसे वही अक्षुण्ण बनाती है

यह धर्म सनातन तो है तब से
जबसे सृष्टि का सृजन हुआ
यह तब भी होगा विध्यमान
जब विलीन महाप्रलय में जग होगा

आ बैठो इनके चरणों में
शरण तुम्हे भी यह देगी
बुद्धि के विष को क्षीण कर
शुद्धि अमृत सम यह देगी

यह नित्य चिरंतन है सनातन
जिस पर है भैरव का पहरा
यह क्षेत्र महाकाल का है
जो समय-तत्व नियंता हैं

अपने अज्ञान का त्याग करो
देखो विष्णु की अद्भुत लीला
उसमें रमकर ही सत्य दिखे
और यहीं उद्धार तुम्हारा है

: प्राँजल शुक्ल



स्मृति

स्मृति

कल तक धूप जो चुभती थी ,
आज वही लगती मनभावन
कल जो गीत लगता था नीरस
जीवन उसी में आज झलकता

वह राह जिसका कल पग-पग
लगता था एक संघर्ष व्यर्थ सा
आज उसी का हर एक कंकर
याद दिलाता वो छोटा सा अनुभव

पेड़ आम का बड़ा विकट था
चढ़ना उसपर बड़ा कठिन था
आज वहीं वह खड़ा सजीला
कहता बचपन का मैं मित्र पुराना

नानी का वह सुन्दर आंगन
रात तारों को गिन कर सोना
सोते बारिश की बूँदें पडने पर
भाग बिस्तरे संग अंदर आना

बारिश की वह बूंदें पहली
मिट्टी का वह भीगा झौंका
चूल्हे की वह सौंधी रोटी
झाड़ी बेरों की कांटो वाली

उधर मोड़ पर पेड़ कबीट का
दस पत्थर पर गिरता एक था
मंदिर का मौंगरा भी आज तक
उन सालों की याद दिलाता

उठे सुबह तो माँ ने बतलाया
रात लक्ष्मी ने जनी है बछिया
आंखे मीड़ते भागे गौशाला
महीनों मना त्यौहार गले लगाकर

कल जिसका कोई मोल नहीं था
आज अनमोल है वही तुम देखो
आज हो रहा यह भी जो समझो
कल ही फिर से यह दोहराएगा

कुछ भी साथ नहीं जाएगा
धरा यहीं सब रह जाएगा
जीवन नया जब तुम्हें मिलेगा
चक्र यही बस दोहराएगा।


Vibrations

There is nothing but waves . These waves are vibrations . There is no matter as a matter of fact .
Matters are non permanent . Matters exist due to the combinations of ripples caused by vibrations in energy . Energy is permanent and real . This energy is all pervasive and absolute.
There are dimensions only because of our perceptions . Perceptions are imaginative .
Imaginations are induced by senses . Senses are throttled by limitations of capacity of acceptance. 

Thursday, 23 June 2022

दिव्या सनातन

*दिव्य सनातन*

प्रकृति का जो भौतिक नियमन है , वही सनातन है । जिन गूढ़ सिद्धांत-नियमों से परमात्म तत्व प्रकृति-पदार्थ में प्रवर्तित होता है , वही सृष्टि-धर्म कहलाता है । और सृजन के आरंभ से जो पंचमहाभूत दृश्यमान होते हैं और सृष्टि के समारोप तक विध्यमान रहते है , वे सभी उसी ओंकार के स्पंदन से स्पंदित होते है जिससे महतत्व का निर्माण होता है । इसी ओंकार का स्फुरण समस्त सृष्टि में व्याप्त होकर वेद की ॠचाओ का प्रतिपादन करता है और यही वेद की ॠचाऐं समस्त ब्रम्हाण्ड मे गतिमान हैं। इन्ही वैदिक ॠचाओ का भौतिक सूत्र-स्वरूप  जिन नियमों का द्योतक है , वही सनातन धर्म है , वही हिन्दुत्व है ।

जिस प्रकार से प्रकृति को कोई अन्य शक्ति नष्ट कर ही नहीं सकती , किसी कालखण्ड में हानि भले ही पहुंचा दे , उसी प्रकार से किसी समय-काल में हिन्दुत्व को हानि तो हो सकती है परन्तु हिन्दुत्व को नष्ट कर पाना , समाप्त कर पाना किसी भी शक्ति के सामर्थ्य से परे है । क्योंकि इसकी उत्पत्ति,  संवर्धन और संरक्षण तो स्वयं परा-शक्ति करती है ।
जो प्रकृति के अनुरूप है , अनुकूल है और सामंजस्य में है , वही कालांतर में रहने योग्य है , अन्यथा अन्य जो भी हैं उनका काल कवलित होना निश्चित है ।
यही सुर-असुर का भेद है ।
सनातन तो प्रकृति के अधीन है , सनातन तो प्रकृति का ही अंग है और सनातन ही प्रकृति का जीव को जड़ता से चेतन की ओर ले जाने वाला माध्यम भी है ।
सनातन का कोई विकल्प ही नही ।

इति ।।

प्राँजल शुकुल 

बात हौसलों की है

"बात हौसलों की है"

तूफानों का क्या ,
उन्हे तो आना है ,
तबाही मचाना है ,
और चले जाना है ।

बात तो हौसलों की है ,
तूफानों से टकराना है ,
सब मिटता देखकर भी ,
बचे हुए को सम्हालना है ।

दिल से रिसती पीड़ा को ,
इन्हे ही दबाना है ,
उखडती सांसो को फिर ,
इन्हें ही तो चलाना है ।

- प्राँजल शुकुल

17 मई 2021 

अंतर

*अंतर* 

बात जहां तक ले जानी है ,
पहले सोच वहां पहुचे ,
मन तो ठहरा चंचल भंवरा ,
आज यहाँ कल कहाँ टिके ।

धरती से देखो दूर गगन तक ,
सब कुछ कितना नवल दिखे ,
जब देखो चढ़कर पर्वत पर  ,
धरती ही कुछ और दिखे ।

यहाँ मेघ जो जल बरसाते ,
पर्वत पर वह बन हिम गिरे ,
यहाँ कलकल कर बहती नदिया ,
वहां ठोस हिमखंड बने। 

कहाँ तुम्हे जाना है राही ,
तय पहले यह लक्ष्य करो ,
और लक्ष्य पर जब मैं पहुंचू ,
क्या करना यह ध्यान करो ।

मार्ग अनेकों मिल जाऐंगे, 
पर तुम फिर भी मनन करो ,
चयन मार्ग का बड़ा झमेला ,
सरल कठिन का भेद करो ।

क्योंकि ध्येय तक बड़ा मार्ग है ,
यहाँ समय होगा अधिकांश व्यय  ,
पर यह भी तो है तुम्हें सोचना ,
क्या नहीं इसमें व्यय करना अपना ।

इन मार्गों में कांटो के संग ,
डग डग पर है बिखरा मैला  ,
अपने निर्मल अंतः करण को ,
बड़े यत्न से स्वच्छ है रखना ।


प्राँजल शुकुल 
23 06 2022

प्रवाह

*प्रवाह*

नदी किनारे बैठ देखता ,
तिनके पत्तों का बह जाना ,
वेग जहाँ लेकर के जाता ,
वहीं उन्हे है रमते जाना । 

जीवन का आनंद यही है ,
बैठो माया की लहरों पर , 
करो नही संघर्ष व्यर्थ का ,
जहाँ लहर हो बहते जाना। 

लहरों की इस ऊंच नीच में ,
सांसो को ऐसे ही थामे ,
देखो तट के दृश्य मनोरम ,
कुछ भी यहाँ ना रहने वाला ।

है आज लहर के उपर जो पत्ता ,
धीरे धीरे वह गल जाएगा ,
तब वह लहर के नीचे जाकर ,
नदिया का ही हिस्सा बन जाएगा। 


:
प्राँजल शुकुल / 20 जून 2022