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यह समय नहीं विश्राम का ,
यह बेला नहीं विराम की ,
ये मोड़ है निश्चय को दृढ़ कर ,
पाने , भारत के सम्मान का ।
ना देखो जग की ओर सोच ,
कि वे क्या-कैसे हमें रोकेंगे ,
तुम देखो आस ले हिन्द खड़ा ,
कब स्थापित हो धर्म , शौर्य से ।
वो वीर शस्त्र ले खड़ा सजग ,
गौरव-गाथा का निज मान लिऐ ,
मन में पर उसके कितनी दुविधा ,
वो कब तक नित स्व-प्राण तजे ।
तुम तो बस यह इस बार करो ,
यह समय ना फिर से आएगा ,
जो आज किया वो रहे सदा ,
आगे ना कुछ भी हो पाएगा ।
तुम पर हम वारे जाते है ,
तन मन से हैं सब साथ खड़े ,
हर स्थिति संभालेंगे मिलकर ,
जो भी हो वो देखा जाऐगा ।
जो दोष दशकों से है मढ़ा ,
हम भारत की संतानों पर ,
जो पीड़ा हमने वर्षों सही ,
अपने ही घर के गद्दारों से ।
वह कलंक धुला दो माथे से ,
चाहे जो कीमत लगे अभी ,
परिस्थिति ना ऐसी फिर आऐगी ,
आने वाले शत कालों तक ।
जो रहें साथ स्वागत उनका ,
पर जो देखें स्वप्न विखंडन का ,
उनको उनका गंतव्य दिखा ,
पहुँचा दो जलती कबरो तक ।
ऐसा भीषण दो सबक सिखा ,
भारत के हर उस अपराधी को ,
साहस ना कर कोई पुनः सके ,
वैसा यत्न कभी कर सकने को ।
नही चाहिए वो धारा जो ,
धारा का ही अवरोध करे ,
नहीं सहमत उस अनुच्छेद से ,
जो जन-जन का विच्छेद करे ।
अब समय प्रबल है वीरों का ,
बस तेज राष्ट्र का बढ़ा चले ,
जो खण्डित हुआ वो भी लेंगे ,
औ भारत अखण्ड होगा फिर से ।
: प्राँजल शुक्ल
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